हमारे देश में किसानों की हालत आज कुछ ऐसा है- हमें तो अपनों ने लुटा, गैरों में कहां दम था.....
कृषि प्रधान कहे जाने वाले देश में किसान बनना आज के दौर में अभिशाप बन गया है।
हमारे देश के महापुरुषों ने कहा है कि किसान पूरी मानवता का पालक है । लेकिन जो मानवता का पालक है, वही आज आत्महत्या करने को बेबस है।
आजादी से आज तक इन 74 सालों में, सभी पार्टियों ने किसानों के ऊपर अपने तरीके से जबरदस्त राजनीति किया। लेकिन किसी ने किसानों का सही मायने में विकास नहीं किया। अगर विकास किया होता तो आज किसान मरता नहीं । आए दिन हम सुनते हैं कि इस अमुक राज्य में इतने किसान भाइयों ने आत्महत्या कर लिया। कोई फसल खराब होने की वजह से, कोई कर्ज नहीं चुका पाने के कारण से तो कोई खाद की महंगाई जैसे कारणों की वजह से अधिकतर किसान आत्महत्या करते हैं ।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, 2019 में करीब 43,000 किसानों और दिहाड़ी मजदूरों ने आत्महत्या की ।
आजादी से लेकर आज तक इन 74 सालों में एक अधिकारी की आय में 200 % की वृद्धि, एक सरकारी शिक्षक की आय में 210 % की वृद्धि, सांसद - विधायकों के आय में 200 % की वृद्धि। लेकिन एक किसान की आय में मात्र 21 % की वृद्धि हुआ है । मोदी सरकार में हुए सर्वे में किसानों की कमाई 8,931 रुपए बताई। यानी, मनमोहन से लेकर मोदी सरकार तक किसानों की महीने की कमाई महज 2 हजार 505 रुपए ही बढ़ी ।
इतना ही नहीं देश के 22.5 % किसान गरीबी रेखा से नीचे आते हैं, यानी हर 10 में से 2 किसान। इनमें सबसे ज्यादा 45.3 % किसान झारखंड के हैं ।
अब तो सरकार ने आंकड़ा देना भी बंद कर दिया है । आपको पता होगा कि संसद से 3 विधेयक पारित हुआ था, जिसको किसानों ने काला कानून कहा और उनका विरोध करने के लिए आज तक किसान आंदोलन कर रहा है। अभी तक 450 किसान शहीद हो गया, लेकिन किसी को कोई चिंता नहीं। पहले अंग्रेजों ने भारत की कृषि को बर्बाद किया। आज काले अंग्रेज भारत के किसानों को बर्बाद कर रहा है । आज सरकार कृषि को भी पूंजीपतियों के हाथ में सौंपने जा रहा है । यह कृषि क्षेत्र पूंजीपतियों के हाथ में चला जाएगा, तो एक मोरिंगा का साग भी प्लास्टिक में लिपटकर मॉल में बिकेगा ।
क्या इसी दिन के लिए हमारे देश के 7,32,000 क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया था।
