झारखंड के कोटालपोखर गांव के सनातनी राष्ट्रवादियों ने धूमधाम से मनाया भारतीय वैदिक नववर्ष 2079 (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा)
कल भारतीय नववर्ष के अवसर पर, नई दुर्गा मंदिर - शान्ति चौक (कोटालपोखर) में उधवा के प्रसिद्ध वैदिक पुरोहित पंडित ज्ञानचंद आर्य द्वारा “वैदिक हवन यज्ञ कार्यक्रम" को सफलतापूर्वक सम्पन्न किया गया। हवन कार्यक्रम में मुख्य रूप से कार्यक्रम आयोजक गोविन्द कुमार साहा, प्रमुख सहयोगी श्री राजेश साहा, सहयोगी पप्पू कुमार साहा, सहयोगी सुनील शेखर गुप्ता, हुरू आर्य जी, श्री रंजीत साहा, बप्पी साहा, सुनील साहा, गणेश आर्य, सत्यम आर्य, श्री शंकर माली, राजीव रंजन, शिवलाल रजवार साथ ही संस्कृति क्लासेज के छात्राएं भी उपस्थित हुई। कार्यक्रम के सफल आयोजन हेतु मुख्य रूप से राजेश साहा, नारायण यादव (फूलचुवा), भवेश साहा (डीपू रोड), राजेश साहा (गुरु मार्केट), अरुण साहा (मेडिकल), राजू साहा, परशुराम साहा (हिरणपुर) आदि जागरूक सामाजिक लोगों ने यथासंभव अपना सहयोग दिया।
हवन के पश्चात, वैदिक पंडित ज्ञानचंद आर्य जी ने अपने उदबोधन में राष्ट्रहित, सनातन संस्कृति हित में समाज को सदैव तत्पर रहने को प्रेरित किया। उन्होंने कहा- हमें सदैव सत्य का अनुसरण तथा असत्य के त्याग करने में आगे रहना चाहिए। आज हमारे समाज में अनेक कुप्रथाओं जैसे पशुबलि, मांसाहार और शराब मदिरा सेवन जैसे अनेक राक्षसी कृत्यों ने जन्म ले लिया, जिससे संस्कृति का विनाश हो रहा है। समाज को आगे बढ़ाने के लिए ऐसे गलत कार्यों का हमेशा विरोध करना चाहिए।
एक ओर जहां, अंग्रेजी न्यू ईयर की शुरुआत अधिकतर लोग अंग्रेजी संस्कृति के अनुसार, मांस मदिरा सेवन से हुड़दंग मचाके करते हैं तो दूसरी ओर, हम सभी सनातनी अपने भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को बड़े ही शांतिपूर्ण तरीके से हवन यज्ञ इत्यादि अनुष्ठान एवं शुद्ध सात्विक भोजन के साथ करते हैं। और यही हमारी गौरवमयी सनातन संस्कृति है जो कभी भी अंग्रेजों, मलेक्षों के तरह, जीव हत्या करके नववर्ष की शुरुआत नहीं करती। इसलिए कहा गया है, कि वसुधैव कुटुंबकम् की भावना रखने वाले भारतवर्ष यूं ही विश्वगुरु नहीं कहलाया। सतयुगी भारतीय वैदिक संस्कृति यदि श्रेष्ठता में आकाश है तो कलियुगीन मलेक्षोंवाली परंपरा पाताल होगी। इसलिए सभी सनातनियों को यथासंभव दैनिक वैदिक हवन यज्ञ को अपने घर परिवार के सहयोग से करते रहना चाहिए। क्योंकि, यह एक प्राचीन वैज्ञानिक प्रक्रिया है जो वातावरण, पर्यावरण को शुद्ध करते हुए हमें कई बीमारियों से निरोग करती है। प्राचीन शास्त्रों में यज्ञ को ईश्वर का मुख कहा गया है।
एक ओर जहां, अंग्रेजी न्यू ईयर की शुरुआत अधिकतर लोग अंग्रेजी संस्कृति के अनुसार, मांस मदिरा सेवन से हुड़दंग मचाके करते हैं तो दूसरी ओर, हम सभी सनातनी अपने भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को बड़े ही शांतिपूर्ण तरीके से हवन यज्ञ इत्यादि अनुष्ठान एवं शुद्ध सात्विक भोजन के साथ करते हैं। और यही हमारी गौरवमयी सनातन संस्कृति है जो कभी भी अंग्रेजों, मलेक्षों के तरह, जीव हत्या करके नववर्ष की शुरुआत नहीं करती। इसलिए कहा गया है, कि वसुधैव कुटुंबकम् की भावना रखने वाले भारतवर्ष यूं ही विश्वगुरु नहीं कहलाया। सतयुगी भारतीय वैदिक संस्कृति यदि श्रेष्ठता में आकाश है तो कलियुगीन मलेक्षोंवाली परंपरा पाताल होगी। इसलिए सभी सनातनियों को यथासंभव दैनिक वैदिक हवन यज्ञ को अपने घर परिवार के सहयोग से करते रहना चाहिए। क्योंकि, यह एक प्राचीन वैज्ञानिक प्रक्रिया है जो वातावरण, पर्यावरण को शुद्ध करते हुए हमें कई बीमारियों से निरोग करती है। प्राचीन शास्त्रों में यज्ञ को ईश्वर का मुख कहा गया है।
(ऊधवा के प्रसिद्ध वैदिक पुरोहित श्री ज्ञानचन्द आर्य जी)



